
पद्मश्री स्वामी रामस्वरूप शर्मा एक परिचय



!! ब्रज रासलीला !!
!! और !!
!! रासाचार्य स्वामी रामस्वरूप शर्मा !!






रासाचार्य स्वामी रामस्वरूप शर्मा ने ब्रज रास लीला को आध्यात्म से जोड़कर भारतीय प्राचीन परंपरा व संस्कृति के प्रमुख तत्वों को खोजा था ! उन्होंने इसे संगीत के अधिष्ठान नाद से जोड़कर संगीत की उभयविध धाराओं की राग रागिनियों से इसे सजाया-संवारा था ! नाट्यधरा से जुड़कर इसे वृत्त, नृत्य तथा नाट्य इन तीनो नाट्य-शास्त्रीय-अंगों को इसमें समाविष्ट किया था ! स्वामी जी ने रासलीला को अभिनय से जोड़ते हुए यह आदर्श रखा था कि लीला ऐसी होनी चाहिए जो लोक का कल्याण करें “लोकस्तू लीला केवलम” ! इसके साथ ही राधा कृष्ण और गोपियों के अनेक लीला स्वरूप को एक साथ विशाल रासमंच पर महारास लीला-अनुकरण के लिए एकत्र कर रसनांसमूहों की उक्ति को साकार रुप प्रदान कर दिया ! महारास लीला की अनुकरणीय विद्या स्वामी जी की ही देन है !
स्वामी जी को जन्मजात कल कंठ प्राप्त था - “कोयल सदृश्य पंचम स्वर” पर जब उनकी वाणी गूंजती थी तो रासमंच के विशाल पंडाल में एक अजीब सी आनंदमई खामोशी छा जाती थी ! हजारों-लाखो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे ! उनकी स्वर लहरी संजीवनी शक्ति का काम करती थी ! निराशा व कुंठा से नि:सृत मन क्षणभर को सब कुछ विस्मृत कर जाता था ! उनके कल कंठ से ये स्वर लहरी केवल वृंदावन तक ही सीमित नहीं रही थी वरन देश-देशांतर के कोने-कोने अथवा विदेशों के कोने भी इससे अछूते नहीं रहे थे ! इस कथन को कोरी कपोल कल्पना न समझे और फिर “प्रत्यक्ष किम प्रमाणं” अर्थात जो प्रत्यक्ष है उसे प्रमाण की क्या आवश्यकता है !
वृंदावन में प्रतिवर्ष श्रावण मास और फागुन मास में लगभग 30-40 दिन तक वृंदावन की रमणरेती में स्वामी जी द्वारा निर्मित कराए गए 10000 वर्ग मीटर के क्षेत्र में 25000 दर्शको वाले विशाल पंडाल में प्रतिदिन प्रातः और श्याम को लगातार तीन-तीन घंटे तक क्रम से आयोजित होने वाली रामलीला और रासलीला का स्वयं आकर प्रत्यक्ष दर्शन कर बात की सत्यता की परीक्षा की जा सकती थी ! इन दोनों लीलानुकर्णो के सूत्रधार स्वयं स्वामी रामस्वरूप जी होते थे ! वे दोनों समय विशाल पंडाल मंच के एक कोने में हारमोनियम लेकर लगातार 3 से 4 घंटे तक खड़े रहकर प्रतिदिन नई-नई लीलाओं का संचालन स्वयं करते थे ! उनका कंठ क्षणभर का अवकाश लिए बगैर स्वर लहरियों बिखेरता रहता था और लगभग 25-30 हजार की संख्या में बैठे श्रोता व् दर्शक उसे दोनों कानों से बटोरते रहते थे ! उस समय यही पश्चाताप रहता था कि भगवान ने उन्हें दो ही कान क्यों दिए ! हारमोनियम पर विद्युत की गति से चलती स्वामी जी की उंगलियां उनके कलकंठ से मधुर स्वर लहरियां तथा झांझ, ढफ, ढोल, मजीरा व मृदंग की थाप पर विशाल मंच पर अष्टसखी परीकर के साथ नृत्य करते श्री राधाकृष्ण की मनोहर झांकी पर दर्शक ठगे से रह जाते थे !!




3-4 घंटे का समय उन्हें 3-4 मिनट जैसा प्रतीत होता था ! यह अतिशयोक्ति नहीं किंतु यथार्थ व कटु सत्य है ! जिस तन्मयता के साथ स्वामी जी रासलीला का संचालन करते थे उसी तन्मयता के साथ वे रामलीला का भी संचालन करते थे ! इन लीलाओं के प्रदर्शन के समय स्वामी जी के भाव को देख कर दर्शक यही नहीं समझ पाते कि स्वामी जी राम भक्त है या श्री कृष्ण भक्त ! जब वह रामलीला का संचालन करते हैं तो रामभक्त के रूप में दृष्टिगोचर होते थे और जब कृष्ण लीला कृष्ण का संचालन करते थे तो कृष्ण भक्त के रूप में दिखते थे ! गोस्वामी तुलसीदास ने अपने जिस काव्य-लेखन के आधार पर राम व कृष्ण में समन्वय किया था स्वामी रामस्वरूप जी ने उसे रंगमंच पर प्रत्यक्ष कर दीखलाया !!
सावन व फागुन मास में वृंदावन में स्वामी रामस्वरूप जी शर्मा द्वारा आयोजित लीला में अनेक प्रेमी विदेशी भक्त प्रति वर्ष नियमित रूप से आकर रासलीला का आनंद लेते थे ! ऐसा कोई वर्ष नहीं जाता था ! जिस वर्ष दो-चार केंद्रीय मंत्री और विभिन्न राज्यों के दस-बीस राज्यमंत्री रासलीला का दर्शन करने ना आते हो ! स्वामी जी में यह विशेषता है की अपनी राजनीतिक पार्टी भाजपा की प्रति पूर्ण समर्पित रहने पर भी किसी अन्य राजनीतिक पार्टी से किसी भी प्रकार का राग द्वेष नहीं रखते थे ! यही कारण है कि उनकी रासलीला में सभी पार्टियों के छोटे-बड़े सभी नेता व मंत्री गण सम्मिलित होकर दर्शन करते थे ! उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य-प्रदेश, दिल्ली के कई केंद्रीय राज्य मंत्रियों को प्रति वर्ष आते देखा जाता था ! स्वामी रामस्वरूप शर्मा गायन कला में तो पूर्ण पारंगत थे ही, नृत्य कला अभिनय कला में भी पीछे नहीं थे, क्योंकि शैशव बाल व किशोरावस्था के पूरे 17 वर्ष उन्होंने स्वयं कृष्ण का स्वरूप बनकर बिताए थे ! जिन बड़भागी जनों ने इनके कृष्ण स्वरूप का दर्शन किया है वह आज भी उसकी चर्चा कर पुलकित हो उठते !
श्री गिरी गोवर्धन की सुप्रसिद्ध संत श्री शिरोमणि पंडित श्री गया प्रसाद जी महाराज तो इनके कृष्ण स्वरूप के ऐसे अनन्य भक्त थे कि आप के दर्शन किए बगैर जल ग्रहण नहीं करते थे ! श्रीकृष्ण के स्वरुप में जैसा लीला अनुकरण आपने किया वैसा आज तक कोई भी कृष्ण स्वरूप में नहीं कर सका ! यह एक अकाट्य सत्य है ! कृष्ण स्वरूप से उतर जाने पर आपने 17-18 वर्ष की अल्प आयु में ही अपने यशस्वी पिता रासाचार्य स्वामी मेघ श्याम जी से रास लीला की डोर अपने हाथों में ले ली थी और तब से इस क्षेत्र में आपने जो कीर्तिमान स्थापित किए हैं वह आज सबके सामने समक्ष प्रत्यक्ष हैं ! ब्रजरास लीला के आप कुशल संचालक तो थे ही भगवत भक्तों के पवित्र चरित्रों के प्रस्तुतीकरण में भी आप बेजोड़ थे ! सुप्रसिद्ध भक्तों का चरित्र अभिनय आप स्वयं करते देखे जाते थे ! सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र का चरित्र अभिनय आप बखूबी निभाते थे ! रास लीला में श्री कृष्ण सखा, श्री दामा, सुदामा उद्धव का आपके स्वयं के द्वारा प्रस्तुत अभिनय बड़ा ही आकर्षक एवं भाव विभोर कर देने वाला होता था ! जब आप नन्दबाबा का अभिनय करते थे जो ऐसा प्रतीत होता था मानो नंदबाबा साक्षात प्रकट हो उठे हो ! शंकर लीला में आपको भगवान शंकर के रूप में देख कर साक्षात भगवान शंकर की अनुभूति होने लगती थी ! आप अपने कुशल अभिनय से दर्शकों को आत्म विभोर कर देते थे !




स्वामी रामस्वरूप शर्मा का एक स्वरुप और चर्चित हो उठा था ! वह था उनका भागवत कथा व्यास का स्वरूप ! विगत कुछ वर्षों से भागवत कथा के माध्यम से भी वे अपने प्रेमियों को भागवत रस का पान कराते थे ! भागवत के श्लोक को सरस संगीतमय वाणी में सुनकर श्रोताओं का रोम-रोम प्रफुल्लित हो उठता था ! उनकी कथा में रामलीला-रासलीला की ही तरह हजारों श्रोताओं की विशाल भीड़ देखी जा सकती थी ! श्रीमद्भागवत के साथ-साथ ब्रज के सुप्रसिद्ध संत जगद्गुरु स्वामी श्री गुरु शरणानंद जी महाराज के आशीर्वाद स्वरुप आपने श्री राम कथा का गायन एवं प्रवचन भी प्रारंभ किया था !
इधर कई वर्षों से स्वामी जी को सक्रिय राजनीति में अपना योगदान करते हुए भी देखा गया था ! राजनीति के क्षेत्र में मथुरा-वृंदावन की जनता उन्हें कितना पसंद करती थी यह बात तो उनके विधानसभा चुनावों में लगातार दो बार विधायक चुने जाने से ही स्पष्ट हो जाती है ! इसके साथ-साथ यह भी आश्चर्यजनक सत्य है कि राजनीति के क्षेत्र में उनकी कथनी करनी में इंच मात्र भी अंतर नहीं मिलता ! जनता जनार्दन की सेवा में मथुरा वृंदावन की जनता ने उन्हें सर्वदा अग्रिम पंक्ति में पाया था ! राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे बड़े बड़े राजनेताओं से पुरस्कृत व सम्मानित हो चुके थे ! भारत सरकार द्वारा आपको रासलीला के क्षेत्र में देश के चतुर्थ सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री से अलंकृत किया गया था ! अनेक सामाजिक व शैक्षणिक संस्थाओं ने अनेक बार आपका अभिनंदन किया था ! वह स्वयं भी अनेक संस्थाओं से जुड़े हुए थे ! निसंदेह वह बहु-आयामी व्यक्ति के धनी थे ! उनके व्यक्तित्व की सबसे सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह आप “मानप्रद सदा अमानी” अर्थात “स्वयं अमानी रहकर दूसरों को सदा सम्मान देना” ही वे जानते थे ! स्वामी रामस्वरूप शर्मा की रास मंडली में केवल भारत में ही नहीं अपितु देश-विदेश तक अपने कीर्ति स्तंभ स्थापित कर माधुर्य की मंदाकिनी व कला की छठा बिखेरी थी ! उनकी रासलीला की संजीवनी शक्ति से आज न केवल ब्रिज का वर्णन वरन संपूर्ण देश का कण-कण दिव्य हो रहा है ! उसकी प्रभाविता एक विशाल अग्नि का रूप धारण कर आज संपूर्ण लोक को आलोकित कर रही है ! निसंदेह भारतीय संस्कृति के पृष्ठों पर स्वामी रामस्वरूप और उनकी रासलीला स्वर्णिम अक्षरों में लिखी जा चुकी है भारत सरकार ने भी स्वामी जी की रासलीला एवं भारतीय संस्कृति को समर्पित कार्यों को दृष्टिगत करते हुए उन्हें पद्मश्री सम्मान से अलंकृत कर ब्रिज को गौरवान्वित किया था ! जय श्री राधे !